एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं?

एक जीवन जीनें को चला, एक जीवन जी कर चला
एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं?

जो तेरे खातर लकड़ी का वाँकर आया
तो मेरे लिए भी लकड़ी की लाठी आयी

फिर भी चल तो तू भी नहीं पाया
और चल तो मैं भी नहीं पाया

एक रोज़ जो निकल पड़े घर से अकेले ही,
तो लौट तू भी नहीं पाया और लौट मैं भी नहीं पाया

हड्डियाँ अभी तेरी कमजो़र हैं, तो अपना भी हाल कुछ ऐसा हैं
एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं?

मीठा तुझें भी पसंद हैं, मीठा मुझें भी पसंद हैं, 
जो कुछ खा सके, वो दांत तेरे भी नहीं हैं, वो दांत मेरे भी नहीं हैं

कभी घुटनों पर तू चलता हैं, 
तो कभी घोड़ा बन घुटनों पर मैं चलता हूँ

जो डांट तुझे पड़ती हैं,
तो निकलती आवाज़ मेरी भी नहीं हैं

अपने - पराये अभी तेरी समझ़ से परे हैं, तो अपना भी हाल कुछ ऐसा हैं
एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं?

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