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इस बार गल्ती मेरी नहीं है माँ‌!

इस बार गल्ती मेरी नहीं है माँ मेंने नहीं कहा था इन परिन्दो से, के ये पंख तुम्हारे मेने दिए हैं फिर भी ये मेरे आस रहे। मेंने नहीं सिखाया था उड़ना इनको फिर भी ये मेरे पास रहे। फ़िर क्यूँ ..?  फिर क्यूँ... जो मुझे मोह हुआ तो चल दिए, बुझाकर ये जलती शामां अंगारो बीच जलता रहा मैं अकेला, देखती राही मुझेको यें भीड़ जमां इस बार गल्ती मेरी नहीं है माँ --  मेंने तो सिर्फ अपना साथ दिया था जब जिसने जिस तरह अपना माना, उसको अपना हाथ दिया था नहीं रख्खी थी उम्मिद के ये परिणाम क्या लाएगा सबकी तरह मेंने भी कहा, जो होगा देखा जाएगा फ़िर क्यूँ ..? फिर क्यूँ... मुझे इन कर्जोंं ‌‌और फर्जों में डुबोया गया, जब से लगा हूँ पैसे कमां इस बार गल्ती मेरी नहीं है माँ, इस बार गल्ती मेरी नहीं है माँ।

एक इतवार ऐैसा भी

कल रविवार है और आज मुझे बुखार है कैसा ये जूनून है, कैसा ये खुमार है मम्मी देखना, कल सभी आएँगे मुझे बुलाने बता देना सब सच सच, तुम करना न कोई बहाने उन सब में एक मेरा जिग़री होगा जिसको समझ सिर्फ़ इतनी, "अरे चल न यार, कुछ नहीं होगा" पर तुम उसको डाँटना मत, वो तुमसे डरता अब भी है ज़िद्दी है थोड़ा, करता नादानियाँ वो अब भी है मेरी सुनो तोह बस इतनी सी बात का ख्याल रखना जिसको मेरा ख्याल आया है अभी, तुम उसका भी ख्याल रखना

एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं?

एक जीवन जीनें को चला, एक जीवन जी कर चला एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं? जो तेरे खातर लकड़ी का वाँकर आया तो मेरे लिए भी लकड़ी की लाठी आयी फिर भी चल तो तू भी नहीं पाया और चल तो मैं भी नहीं पाया एक रोज़ जो निकल पड़े घर से अकेले ही, तो लौट तू भी नहीं पाया और लौट मैं भी नहीं पाया हड्डियाँ अभी तेरी कमजो़र हैं, तो अपना भी हाल कुछ ऐसा हैं एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं? मीठा तुझें भी पसंद हैं, मीठा मुझें भी पसंद हैं,  जो कुछ खा सके, वो दांत तेरे भी नहीं हैं, वो दांत मेरे भी नहीं हैं कभी घुटनों पर तू चलता हैं,  तो कभी घोड़ा बन घुटनों पर मैं चलता हूँ जो डांट तुझे पड़ती हैं, तो निकलती आवाज़ मेरी भी नहीं हैं अपने - पराये अभी तेरी समझ़ से परे हैं, तो अपना भी हाल कुछ ऐसा हैं एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं?

सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख अंधेरो को कब तक कोसेगा, रोशनी का दीपक जलाकर तो देख मंजि़ल जो भी हो, राह सबकी आसान कहां होती है वक्त, वक्त-बेवक्त पैगाम तो देता है हर कोई समझ़ सके ये बात आम कहां होती है हौसला है, आज डगमगाया है तो क्या हुआं तू कल की उम्मीद में उडा़न भर कर तो देख सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख आज़ बुलंदी को छूने की चाहत है तेरी, तो कल शिख़र पर कदम तेरे भी होंगे बंदगी हो प्यार की तो, पंख भी तेरे - परींदा भी तू - और तो और उड़ान भी तेरी होगी तू खुद एक सफलता की नींव रख, तू खुद एक शिखर बना, सपनो की दुनिया को हकीकत बना ज़माने की गैल छोड़ तू, खुद की पगडंडी बना कर तो देख सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख अभी जो जिद् की है तूने, तो शिकायत सबको हमेशा रहेगी कभी खुद् से तो कभी दूसरो से बगावत सरे-आम रहेगी कौन आता है, कौन जाता है, कई रूठें हैं तो कई टूटे भी हैं कितनो को मनाएगा, कितनो को अपनाएगा, और तो और किस - किस को समझायेगा कभी - खुशी से - दर्पन में - खुद को - जी़ भर कर तो देख सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख साथी तो सबके होते है, पर वक्त सा सथी नहीं देखा धूप तो ...

Waqt Ki Khwahishen

Waqt ki khwahishen Jo chup rehkar bhi keh gaya Jo din dhup haskar seh gaya Wo bachpana tha kaliyon sa Fir wo waqt ki khwahishen or sab beh gaya Kuch shabdo ka khel raha to kuch palo ka mel bhi Shikaytey to hame bhi thi Ishq k sataye ham bhi Kuch chahatey hamari To kuch khwahishen uski Pagal to tha sara jag uska Masoom muskan thi jiski Fir Wo tirchi najar, unka kahar Wo halki muskan, me besabar Wo kali ghata, julfo ka nagar Uff.. fir wo wakt ki khwashein, or sb be asar Kuch raaj sa tha wo saaz uska Shringar to tha uspr noor uska Kehti thi na hai mohabbat Har muskan me tha ikraar uska Wo mousum tha sardiyo ka Kuch pal me sadiyo ka Wo dhadakan me saanso ka Intezaar tha uski baaho ka Daur bhi aaya uska, mila usse bhi moka Thi karwatein ya silvatein, Ya tha nazro ka dhoka Ab na kisi se nafrat-a-ishq or na kisi se ishq-a-wafa Bas Waqt ki Khwashein, or sb rafaa dafaa

Kuch Baatey

Kuch Baatey.. Kuch batey kisi se keh nahi sakta Kuch batey khud seh nahi sakta Kuch batey dil-e-arman hoti hai Kuch batey dil ka farman hoti hai Kuch bato ki asmanjas si hai Kuch bato ki kashmkash si hai Kuch bate baya hamse hui nahi Kuch bato se ruh barbash si hai Kuch batey uski hoti hai Kuch batey usse hoti hai Kuch batey wo bin bole samjhti hai Kuch batey uski unsuljhi si hoti hai Kuch bato se uski yad aati hai Kuch bato se dil bahalta hai Kuch batey dil me sama jati hai Kuch bato se mann mehkta hai Kuch batey hai jo wo keh nahi pati Kuch batey wo samajhe bager reh nahi pati Kuch bato ka matlab saaf hota hai Kuch bato ko sunne ka dil talabgar hota hai. Kuch batey bin sir per ki hoti hai Kuch batey har sham dopaher ki hoti hai Kuch batey an-kahi si hoti hai Kuch batey dil ki dhadkan si hoti hai. Kuch baatey dilkash bhi hoti hai... Kuch Baatey fir bhi hoti hai Kuch Baatey