सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख
अंधेरो को कब तक कोसेगा, रोशनी का दीपक जलाकर तो देख

मंजि़ल जो भी हो, राह सबकी आसान कहां होती है
वक्त, वक्त-बेवक्त पैगाम तो देता है
हर कोई समझ़ सके ये बात आम कहां होती है
हौसला है, आज डगमगाया है तो क्या हुआं
तू कल की उम्मीद में उडा़न भर कर तो देख
सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

आज़ बुलंदी को छूने की चाहत है तेरी,
तो कल शिख़र पर कदम तेरे भी होंगे
बंदगी हो प्यार की तो, पंख भी तेरे - परींदा भी तू - और तो और उड़ान भी तेरी होगी
तू खुद एक सफलता की नींव रख, तू खुद एक शिखर बना, सपनो की दुनिया को हकीकत बना
ज़माने की गैल छोड़ तू, खुद की पगडंडी बना कर तो देख
सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

अभी जो जिद् की है तूने, तो शिकायत सबको हमेशा रहेगी
कभी खुद् से तो कभी दूसरो से बगावत सरे-आम रहेगी
कौन आता है, कौन जाता है, कई रूठें हैं तो कई टूटे भी हैं
कितनो को मनाएगा, कितनो को अपनाएगा, और तो और किस - किस को समझायेगा
कभी - खुशी से - दर्पन में - खुद को - जी़ भर कर तो देख
सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

साथी तो सबके होते है, पर वक्त सा सथी नहीं देखा
धूप तो खूब खिली आज़, मौस़म भी खुशनुमां निकला
सभी की नज़रो ने - इस नज़ारे को - एक नज़रिए से देखते - नहीं देखा
नज़र खुद की हैं तो - नज़ारें भी खुद के, तू चस्मदीद ज़मानें को बना कर तो देख
सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

कैसे कहूं वो जो आज़ साथी बना है - कल को स्वार्थी नहीं बनेगा
इंसानी बस्ती में कौन कैसा है, तू किस-किस को कब-कब परखेगा
खूबसूरती - सिर्फ शक्ल से परखने वालों को कैसे समझायेगा,
प्यार होता हैं क्या - कैसे बतलायेगा
भर के उड़ान तू उड़ता चला जा,
ख्वाहिशें अपनी - जिंदगी अपनी - तू जीते चला जा
शाम हुई है आज़ तो क्या, कल की भोर को तो तू देख
सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

अंधेरो को कब तक कोसेगा, रोशनी का दीपक जलाकर तो देख
सुबह हुई हैं दोस्त, आंख खोल कर तो देख

Comments

Popular posts from this blog

एक जीवन जीनें को यें रचा खेल कैसा हैं?

इस बार गल्ती मेरी नहीं है माँ‌!

Waqt Ki Khwahishen